जीवन की नैया का चतुर खिवैया मैं
भवसागर में नाव बढ़ाए जाता हूँ।

ये उद्दाम तरंगे मुझसे कहती हैं,
हम तेरा अस्तित्व मिटा कर छोड़ेंगी।
मेरी लंबी बाहें मुझ से कहती हैं,
इनसे डर कर नाव न अपनी मोड़ेंगी।
तूफ़ानों का गर्जन-तर्जन सुन करके,
आशावादी गीतों के स्वर रुँध जाते।
पर नैया में बैठे ये नन्हे राही,
मुझ में नूतन साहस भर कर मुस्काते।
नन्हे राही की किलकारी के बल पर
मैं भंवरों से अपनी नाव बचाता हूँ।
फिर अपनी वंशी के स्वर लहराता हूँ।

मेरा माझी मुझसे कहता रहता था
बिना बात तुम नहीं किसी से टकराना।
पर जो बार बार बाधा बन कर आएँ,
उनके सर को वहीँ कुचल कर बढ़ जाना।
जानबूझ कर मेरे पथ में आती हैं,
भवसागर की चलती फिरती चट्टानें।
मैं इनसे जितना ही बचकर चलता हूँ,
उतना ही मिलती हैं ये ग्रीवा ताने।
रख अपनी पतवार, कुदाली लेकर में,
तब मैं इनका उन्नत भाल झुकाता हूँ।
राह बना कर नाव बढ़ाए जाता हूँ।

अगणित नौकाएँ तोड़ी चट्टानों ने,
तूफानों ने नाविक कई बहाए हैं।
सागर में रहने वाले घड़ियालों ने,
जाने कितने बेबस राही खाए हैं।
मेरे प्रिय, पतवार चलना सीखो तुम।
जीवन की रक्षा हित बहुत जरुरी है,
खुनी लहरों से टकराना सीखो तुम।
वैसे तो मैं हरदम साथ रहूँगा ही,
फिर भी जीने का रहस्य बतलाता हूँ।
तूफ़ानों में नाव बढ़ाए जाता हूँ।

मैं जब बालक था तब इन तूफ़ानों ने,
मेरे प्यारा माझी यहीं डुबोया था।
कोई नाव न मुझे सहारा देती थी,
मैं तब उस क्षण हिचकी भर-भर रोया था।
पर उस माझी की मुझ पर यह करुणा  थी,
मुझे तैरना उसने खूब सिखाया था।
और उसी साहस के बल पर मैं, साथी,
तूफ़ानों को चीर किनारे आया था।
उस दिन से ही अपने जीवन की नैया,
भवसागर की छाती पर तैराता हूँ।
औ’ अपनी वंशी के स्वर लहराता हूँ।

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