सरस्वती के वरद -पुत्र का जीना मुश्किल
क्योंकि कला पर राजनीति छाई जाती है।

कलाकार क्या सोच रहे हो शीश झुका कर ?
पत्नी है क्षय की रोगी, बच्चा शैया पर।
भरा है तुम्हारे जीवन में क्रन्दन-ही क्रन्दन
व्यर्थ कला के लिए मिटाया अपना जीवन।
व्यर्थ पुस्तकें लिख-लिख भरते हो अलमारी,
कर्जा ले, छपवा भी लीं, यदि दो बेचारी।
आलोचक ढिंग समय नहीं है उनको पढ़कर,
तुमको वह कह दे, युग का ‘प्रतिभामय कविवर।’
उसको फुरसत नहीं, मठाधीशों के मठ से  —
उसकी कलम गीत अब उनके ही जाती है।।

मठाधीश बैठे हैं निज दूकान लगाए,
कोई जाए, जाकर उनको शीश झुकाए —
‘तुम युग के निर्माता, मेरे भाग्य-विधाता,
दर्शन किए बिना था जीवन मिटता जाता।’
यह कह उनकी पदरज माथे से चिपटाए,
और स्वयं को फिर उनका सेवक बतलाए।
खुश होकर वह देंगे कुछ पंक्तियाँ निराली,
उन पंक्तियों सहित जिसने पुस्तक छपवाली –
उसको आलोचक युग का लेखक कहता  है,
और प्रकाशक के अधरों पर स्मित आती है।।

पाठक अगर पढ़ेगा, सिर धुन पछताएगा,
मठाधीश के पास पहुँच सीधा जाएगा।
और कहेगा ‘बिना पढ़े सम्मति क्यों दे दी ?
मठाधीश समझेंगे है यह घर का भेदी।
पहले भाषण देंगे, फिर कुछ मुसकाएँगे,
तब उसको अपनी मज़बूरी बतलाएँगे –
‘यह मेरे नाती के फूफा का है भाई,
नाहीं करता तो हो जाती जगत-हँसाई।
क्या तुमको यह ज्ञात नहीं हम मठाधीश हैं।
जो भी कह दें बात वही शोभा पाती है।

है इनको अधिकार कहें बन्दर को भालू,
है इनको अधिकार कहें भिंडी को आलू,
बकरी को भी कामधेनु बतला सकते हैं।
रूठें तो हाथी को गधा बता सकते हैं।
राजनीति के दांव-पेंच इनको आते हैं।
शर्बत समझ रक्त मानव का पी जाते हैं।
छोड़ कला का राग लगाओ इनके नारे,
खुल जाएँगे सचमुच ही प्रिय ! भाग्य तुम्हारे।
सत्ता के ये दास, मनुजता इनकी दासी –
बात न मानव की इनके मन को भाती है।।

यह सुन कलाकार ने अपने नयन उघारे,
मैंने देखा, दहक रहे थे दो अंगारे।
मुरझाए मुखड़े पर ज्योति छाई थी।
जीवन के हित वही सुहानी पुरवाई थी।
बोला -‘प्रिय! रवि शशि पर बादल छा सकते हैं,
छा ही सकते है, पर नहीं मिटा सकते हैं।राजनीति बादल-सम नश्वर मिटने वाली,
किंतु कला रवि, शशि की मनहर ज्योति निराली।।
कला सदा निज साधक पर अमृत बरसाती-
राजनीति की नागिन निज शिशु को खाती है।

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