खग चले क्षितिज की ओर, देख।

गाते जीवन का मधुर गीत, आ गया आज, कल गया बीत, इस मधु-बेला में महासिन्धु के बीच उठी हिल्लोर, देख। खग चले क्षितिज की ओर, देख। हो चले सभी बंदी तारक, चल दिया चाँद, यह सोच, आह रोता है आज चकोर, देख। खग चले क्षितिज की ओर, देख। यह एक Read more…

देवि,-देख-मानव-जीवन-में।

देवि, देख मानव-जीवन में।

नारी बिन नर मौन खड़ा है, नर बिन जीवन बहुत कड़ा है, एक पंख के साथ, कहो, कब विहग भला उड़ सका गगन में। देवि, देख मानव-जीवन में। उर में कम्पन, तन में कम्पन नयनों में चिंतन से जल-कण, धीरे चला जा रहा पंछी जो उड़ता था मस्त पवन में। Read more…

अम्बर पर ये कितने तारे?

कुछ अपनी बातें बतलाते, कुछ मेरी बातें सुन जाते, इतने विस्तृत नील गगन पर रहते हैं सब न्यारे-न्यारे। अम्बर पर ये कितने तारे। मैं अपनी कुटिया में जिस क्षण, स्वयं बना अपने को बंधन, रोता तब आश्वासन मुझको, देते हैं ये मेरे प्यारे । अम्बर पर ये कितने तारे। मैं Read more…

तुम तब आना!

तुम तब आना, जब नभ पर घन दल मँडरायें, चपला चमके मन घबरायें, फिर शीत पवन के झोंकों से तन सिहर उठे, सिर झुक जायें।। औ’ अनजाने में बढ़ जायें मेरी बाँहें आलिंगन को– तब धीरे-धीरे से आकर तुम भुज बन्धन में बँध जाना। तुम तब आना, हो नव वसन्त, Read more…